Saturday, July 30, 2016

एक हुस्न संवरते देखा है

एक हुस्न संवरते देखा है, गुलशन में महकते  देखा है
काफ़िर क्या जाहिद को भी उसे देख बहकते देखा है

परियाँ उसकी दासी है, हाँ वो ऐसी शहजादी है
सारे जहाँ का नूर उस चेहरे पे बरसते देखा है

वो हँसे तो कलियाँ खिलती है, वो चले तो बिजली गिरती है
वो कातिल आँखें क्या कहना एक शोला दमकते देखा है

वो जुल्फें जैसे रात कोई, वो लब जैसे सौगात कोई
उसके एक इशारे पर मौसम भी बदलते देखा है

हर एक का अरमान है वो सबके दिल की जान है वो
उसकी खातिर हर एक का अंदाज बदलते देखा है

दीपक उसके बारे में  और तुम्हे क्या बतलाये
जबसे उसको देखा है बस उसको ही देखा है 

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