हे रावण हे कुम्भकर्ण तुम वापस क्यों नहीं आते हो
क्या आज के मानव से तुम दानव तक घबराते हो ?
क्या मेघनाद की माया भी तुम्हारे काम ना आवेगी
क्या कुम्भकर्ण की सारी शक्ति व्यर्थ ही खो जावेगी
तुम्हारी विद्वता से बढ़कर भी क्या कोई विद्वान हुआ
या सूर्णपखा की चालाकियाँ भी अब धरी रह जावेगी
हे रावण अब खुद पर तुम क्यों नहीं इतराते हो
क्या आज के मानव से तुम दानव तक घबराते हो ?
क्या बिभीषण के धोखे का तुमको पूर्वानुमान है
या लंका दहन को आतुर फिर कोई हनुमान है
अंगद के चरणों से क्या तुम अब भी भयभीत हो
या सीता हरण करने में अब ना तुम्हारा मान है
पुनः विश्व को अपनी गर्जना से क्यों नहीं थर्राते हो
क्या आज के मानव से तुम दानव तक घबराते हो ?
तुम्हारे भीतर का दानव क्या इतना बौना हो बैठा
जिस मानव को समझा तुच्छ, तुमसे बढ़कर हो बैठा
कहाँ गयी श्रीराम की सृष्टि सब तो तुम्हारे चेले है
हर आँगन अब लंका सदृश दूषित हर कोना हो बैठा
हमारे पापों को देखकर शायद तुमतक शरमाते हो
सच ही है हम मानव से तुम दानव तक घबराते हो
क्या आज के मानव से तुम दानव तक घबराते हो ?
क्या मेघनाद की माया भी तुम्हारे काम ना आवेगी
क्या कुम्भकर्ण की सारी शक्ति व्यर्थ ही खो जावेगी
तुम्हारी विद्वता से बढ़कर भी क्या कोई विद्वान हुआ
या सूर्णपखा की चालाकियाँ भी अब धरी रह जावेगी
हे रावण अब खुद पर तुम क्यों नहीं इतराते हो
क्या आज के मानव से तुम दानव तक घबराते हो ?
क्या बिभीषण के धोखे का तुमको पूर्वानुमान है
या लंका दहन को आतुर फिर कोई हनुमान है
अंगद के चरणों से क्या तुम अब भी भयभीत हो
या सीता हरण करने में अब ना तुम्हारा मान है
पुनः विश्व को अपनी गर्जना से क्यों नहीं थर्राते हो
क्या आज के मानव से तुम दानव तक घबराते हो ?
तुम्हारे भीतर का दानव क्या इतना बौना हो बैठा
जिस मानव को समझा तुच्छ, तुमसे बढ़कर हो बैठा
कहाँ गयी श्रीराम की सृष्टि सब तो तुम्हारे चेले है
हर आँगन अब लंका सदृश दूषित हर कोना हो बैठा
हमारे पापों को देखकर शायद तुमतक शरमाते हो
सच ही है हम मानव से तुम दानव तक घबराते हो
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