ये शहर इस कदर बेजान क्यों है
हर शख्श इतना परेशान क्यों है
हर कोई सिमटा है अपनी हदों में
ज़िंदा लाशों का शमशान क्यों है
खुद से ज्यादा मुकद्दर पे है यकीन
खुद अपना दुश्मन इंसान क्यों है
जिसकी खुशबू से महक उठता ये जहाँ
वो गुलिस्ताँ अब गुलों से वीरान क्यों है
जो शहर तेरी हसीं का कायल था कभी
मोहब्बत से अब इतना बेजार क्यों है
आखिर मै भी इंसां हु मेरे भी है अरमां
फिर इजहारे मोहब्बत पे सब हैराँ क्यों है