Thursday, May 24, 2012

शमशान क्यों है

ये शहर इस कदर बेजान क्यों है 
हर शख्श इतना परेशान क्यों है
 
हर कोई सिमटा है अपनी हदों में 
ज़िंदा लाशों का शमशान क्यों है
 
खुद से ज्यादा मुकद्दर पे है यकीन
खुद अपना दुश्मन   इंसान क्यों है  
 
जिसकी खुशबू से महक उठता ये जहाँ
वो गुलिस्ताँ अब गुलों से वीरान क्यों है
 
जो शहर तेरी हसीं का कायल था कभी
मोहब्बत से अब इतना बेजार क्यों है
 
आखिर मै भी इंसां हु मेरे भी है अरमां
फिर इजहारे मोहब्बत पे सब हैराँ क्यों है