वो चुपके चुपके आती है,
और धीमे से मुस्काती है,
आकर पास वो कानों में,
पुन: आमंत्रण दे जाती है|
लो लेने तुम्हें मैं आई हूँ,
ना समझो पीर पराई हूँ,
ये सारा जीवन मिथ्या है,
इक मैं ही तो सच्चाई हूँ|
यूँ टाला है हर बार उसे,
ये कहकर मैंने प्रियजनो
चल दूँगा मैं संग तुम्हारे,
कुछ पल को और धीर धरो
कुछ पल को और धीर धरो
कि...
कुछ कर्ज अभी भी बाकी है,
कुछ फर्ज अभी भी बाकी है,
अपनों की चाह से बिंधा हुआ,
कुछ गर्ज अभी भी बाकी है|
और धीमे से मुस्काती है,
आकर पास वो कानों में,
पुन: आमंत्रण दे जाती है|
लो लेने तुम्हें मैं आई हूँ,
ना समझो पीर पराई हूँ,
ये सारा जीवन मिथ्या है,
इक मैं ही तो सच्चाई हूँ|
यूँ टाला है हर बार उसे,
ये कहकर मैंने प्रियजनो
चल दूँगा मैं संग तुम्हारे,
कुछ पल को और धीर धरो
कुछ पल को और धीर धरो
कि...
कुछ कर्ज अभी भी बाकी है,
कुछ फर्ज अभी भी बाकी है,
अपनों की चाह से बिंधा हुआ,
कुछ गर्ज अभी भी बाकी है|