Thursday, July 21, 2011

ये ख्वाहिश कैसी

मौसमे गुल में अबकी ये खलिश कैसी 
शजर की छाहों में ये तपिश कैसी
 
मह्फूम ही नहीं जाना जब हरूफों का 
जवाबो से बचने की ये कोशिश कैसी
 
कलतलत थी उफ्ताद तमाजत से खोशे  
बेमौसम  ही अचानक ये बारिश कैसी
 
वो चला परवाना  खुद को मिटने
शमा में इतनी ये कशिश कैसी
 
तुझे देखा तो जीस्त का एहसास हुआ
तो मरने की फिर ये ख्वाहिश कैसी

Wednesday, July 6, 2011

ख्वाब हो तुम

किसी मनचले शायर का ख्वाब हो तुम 
सुबह का खिलता गुलाब हो तुम

हो चाहत से भरी सतरंगी चांदनी 
या प्यार की रौशनी का आफ़ताब हो तुम

चेहरे से निगाहों को हटना गंवारा नहीं 
यौवन की वो छलकती कायनात हो तुम

कि जिससे सजती है वादियों कि सरगम 
फिजाओं कि दिलकश वो बहार हो तुम

हो हकीकत में भी तुम कही या फिर 
दीपक के बस ख़यालात हो तुम