मौसमे गुल में अबकी ये खलिश कैसी
शजर की छाहों में ये तपिश कैसी
मह्फूम ही नहीं जाना जब हरूफों का
जवाबो से बचने की ये कोशिश कैसी
कलतलत थी उफ्ताद तमाजत से खोशे
बेमौसम ही अचानक ये बारिश कैसी
वो चला परवाना खुद को मिटने
शमा में इतनी ये कशिश कैसी
तुझे देखा तो जीस्त का एहसास हुआ
तो मरने की फिर ये ख्वाहिश कैसी