Saturday, November 20, 2010

शराफत छोड़ दी है

हर एक अपनी वो आदत छोड़ दी है
शरीफों ने अब शराफत छोड़ दी है
 
बस्तों के बोझ से झुके है कंधे
बच्चों ने करनी शरारत छोड़ दी है
 
भूखे पेट आखिर कब तलक लड़ते
बागियों ने अब बगावत छोड़ दी है
 
रो रो कर हिज्र में जिन्दा लाश बन गए
अहले दिलों ने अब हिमाकत छोड़ दी है
 
कि है पतझर शाखें तो वीरां होंगी ही
शज़र ने भी करनी हिफाजत छोड़ दी है

Thursday, November 4, 2010

हमपर अपनों के अहसान बहुत है

हमपर  अपनों के अहसान बहुत है
उनकी मेहरबानियों की दास्तान बहुत है
सौ बार सवारा फिर भी उजरते ही चले गए
अरमानो के टूटे हुए काशान बहुत है
हर एक ने हमको मारा नादान समझ के
हम जानते थे इस राह में शमशान बहुत है
एक बार मेरे होंठो पे मुस्कान उभर आई थी
ये जानकार मेरे हमदर्द परेशान बहुत है
बेवफा वो नहीं तेरी किस्मत है दीपक
जो अब तक तेरी दुनियां वीरान बहुत है

Sunday, October 10, 2010

मेरे सब्र को और इन्तहा न दे

मेरे  सब्र को  और इन्तहा न दे
जख्म देकर मुझको दवा न दे

शोलो की तपिश से होगा बचना मुश्किल
सोयी हुयी है चिंगारियां हवा न दे

तनहा ही चलूँगा मै जानिबे  मंजिल
कि अब मुझे कोई कारवां न दे

एक हंसी की कीमत मै जानता हूँ
यादों के खुशनुमा जहाँ न दे

हर रोज एक नया ख़त लिख कर
गमे जुदाई मुझे बारहा न दे