Monday, August 15, 2016

कुछ वक्त बेकदर था कुछ तुम भी बेखबर थे

कुछ वक्त बेकदर था कुछ तुम भी बेखबर थे
हमने भी बहुत चाहा पर होंठ सिल गए थे

जलते है सोचकर उन शख्सों की खुशनसीबी
जिन्हें तेरी सोहबत के कुछ पल मयस्सर थे

जमाने ने हमको दीवाना भी कह दिया
कुछ तुममे उलझे हमी इसकदर थे

तेरी सगाई की खबर जो हमतक पहुंची
नयनों से बहते बस आंसुओं के सागर थे

आता है याद अब भी गुजरा हुआ ज़माना
सोचते है हम भी आखिर  कितने बेअसर थे

मन में प्यार का दीप जला बैठे हैं

मन में प्यार का दीप जला बैठे हैं
हार कर दिल से दिल गवां बैठे है

बीत गए लम्हे मेरे इंतजार के
रखे हुए सारे अरमान लुटा बैठे है

निगाहों में शायद बस गया है कोई
भान है हमें किससे दिल लगा बैठे है

यादों में शायद मेरी बस गया है कोई
रस्तों पे उनके लिए पलके बिछा बैठे है

कह देना ऐ हवाओं जाकर उनसे
रब दी सौ हम प्यार जता बैठे है

ताउम्र हम जलते रहेंगे उनके प्यार में
है खबर हम किससे दिल लगा बैठे है 

खुद अपनी हसरतों से गाफिल था मै

खुद अपनी हसरतों से गाफिल था मै
खुद अपनी जीस्त का कातिल था मै

मौसमें-गुल की खुमारी थी हरसूं
बस एक गुल का ही साइल था मै

थे इरादे बहुत नेक मगर क्या करूं
खुद से ही बेवफाई का शाहिद था मै

 दामन  में जिसके कभी हलचल ना हुई
 एक ऐसा बदनसीब वो साहिल था मै

अच्छा है आज तेरा भी साथ छूटा
कब किसके प्यार के काबिल था मै 
यूँ सजधज के तेरा आना नजरों से कहर ढाना
मेरे दिल को भा गया है तेरा ऐसे मुस्कुराना 

हूँ तो दीपक ही मै जलता चला जाऊंगा

हूँ तो दीपक ही मै जलता चला जाऊंगा
जमाने को रोशन करता चला जाऊँगा

हवा आज जितनी भी आजमाइश ले ले
दरिया-ए-फिज़ा में बहता चला जाऊँगा

जो सितमगरों के गर  सितम साथ होंगे
हमदर्दों की दुआ भी साथ लिए जाऊँगा

अपनी फितरत पे होता है सबको गुमाँ
वक्ते-रुखसत में हर पल मुस्कुराऊंगा

खुद के मिट जाने का मुझको क्यों गम हो
तारीकियों में  मै ही याद किया जाऊँगा

Friday, August 5, 2016

कभी वो मेरा हमदम मेरा हमराज हुआ करता था
जिसकी वफाओं पे मुझे नाज हुआ करता था
बेरहम वक्त ने जाने उसे कैसे बदल डाला
जो मेरी हर गजल का साज हुआ करता था

तेरे शहर के लोगो को ये फेन हासिल है
नजर में उतरते ही नजर फेर लेते है 
इश्क हो सनम हो अजीब पागलपन हो
दीवानों को होश भला रास कहाँ आते है 

शुभ प्रभात

जब प्रभात की पहली किरण तेरे चेहरे पे मुस्काये
हवा के हलके झोकें तेरी जुल्फों पे बल खाए

पुष्प सभी  उपवन के तेरी साँसों को महकाए
और सुबह की शीतलता तेरे मुखरे पे इतराए

दूर कहीं मंदिर की घंटी तेरे कानो में रस घोले
और तेरे सपनों की दुनिया भी उसके पीछे हो ले

एक चुभन हो मीठी सी और और थोरा मन भरमाये
शुभ प्रभात इसे मेरा समझना और क्या बतलाये 

जो भी करते है हम बेहिसाब करते है

जो भी करते है हम बेहिसाब करते है
कहाँ अपने कामो का हिसाब करते है

यही तो अपनी जिंदगी के फलसफे है यारों
मंदिर तो कभी मैकदों में शामे- बहार करते है

बात वतन की हो तो रूह तलत भी हाजिर है
जो इश्क भी करते है तो बेशुमार करते है

माना तुम्हारे साथ का मोहताज रहा हूँ मै
दोस्तों हम भी तुमपे जाँनिसार करते है

हर लम्हा  अब जुस्तजू है बस तेरी मुझे
दीवानावार हम बस तुझे तलाश करते है  

जिंदगी इस तरह भी मिलती है

आजकल जिंदगी कुछ इस तरह ही कटती है
गैरों की छोड़ो अब खुद से ही नहीं बनती है

वो हौसले वो चाहतें जज्बात जाने कहाँ गए
सपनों में कहाँ अब वो हँसते हुए मिलती है

उम्रे- दराज गुजार दी यारों की महफ़िलों में
साये के बगैर ही अब शामे मेरी ढलती है

हर शख्स के चेहरे कोई और ही अक्स है
यूँ भोलेपन से यारों अब बाते कहाँ बनती है

सबकुछ तो यहाँ पाया तेरी चाहत के सिवा
क्या पता था जिंदगी इस तरह भी मिलती है