आजकल जिंदगी कुछ इस तरह ही कटती है
गैरों की छोड़ो अब खुद से ही नहीं बनती है
वो हौसले वो चाहतें जज्बात जाने कहाँ गए
सपनों में कहाँ अब वो हँसते हुए मिलती है
उम्रे- दराज गुजार दी यारों की महफ़िलों में
साये के बगैर ही अब शामे मेरी ढलती है
हर शख्स के चेहरे कोई और ही अक्स है
यूँ भोलेपन से यारों अब बाते कहाँ बनती है
सबकुछ तो यहाँ पाया तेरी चाहत के सिवा
क्या पता था जिंदगी इस तरह भी मिलती है
गैरों की छोड़ो अब खुद से ही नहीं बनती है
वो हौसले वो चाहतें जज्बात जाने कहाँ गए
सपनों में कहाँ अब वो हँसते हुए मिलती है
उम्रे- दराज गुजार दी यारों की महफ़िलों में
साये के बगैर ही अब शामे मेरी ढलती है
हर शख्स के चेहरे कोई और ही अक्स है
यूँ भोलेपन से यारों अब बाते कहाँ बनती है
सबकुछ तो यहाँ पाया तेरी चाहत के सिवा
क्या पता था जिंदगी इस तरह भी मिलती है
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