Tuesday, July 26, 2016

हर शख्स इस बज्म में एक नकाब लिए घूमता है

हर शख्स इस बज्म में एक नकाब लिए घूमता है
हर दिन मेरा दिल यहाँ नया अजाब लिए घूमता है

कुछ उनकी गुमनामियाँ कुछ अपनी बदनामियाँ
कि आज भी वो गैरों सा अंदाज लिए घूमता है

एक फूल उसपर आ गिरा जाने कहाँ बहार में
वो अब तलत तबीयत  नासाज लिए घूमता है

उस यार के घर का पता मै ढूंढ रहा हूँ यारों
जो नाम आँखों में अपनी बहार लिए घूमता है

मेरी हसीं के जानिब आप, ये वहम मत पालिए
हर घड़ी मेरा खुदा दर्दे-सैलाब लिए घूमता है 

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