Saturday, November 20, 2010

शराफत छोड़ दी है

हर एक अपनी वो आदत छोड़ दी है
शरीफों ने अब शराफत छोड़ दी है
 
बस्तों के बोझ से झुके है कंधे
बच्चों ने करनी शरारत छोड़ दी है
 
भूखे पेट आखिर कब तलक लड़ते
बागियों ने अब बगावत छोड़ दी है
 
रो रो कर हिज्र में जिन्दा लाश बन गए
अहले दिलों ने अब हिमाकत छोड़ दी है
 
कि है पतझर शाखें तो वीरां होंगी ही
शज़र ने भी करनी हिफाजत छोड़ दी है

1 comment:

  1. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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