Wednesday, July 6, 2011

ख्वाब हो तुम

किसी मनचले शायर का ख्वाब हो तुम 
सुबह का खिलता गुलाब हो तुम

हो चाहत से भरी सतरंगी चांदनी 
या प्यार की रौशनी का आफ़ताब हो तुम

चेहरे से निगाहों को हटना गंवारा नहीं 
यौवन की वो छलकती कायनात हो तुम

कि जिससे सजती है वादियों कि सरगम 
फिजाओं कि दिलकश वो बहार हो तुम

हो हकीकत में भी तुम कही या फिर 
दीपक के बस ख़यालात हो तुम  

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