Thursday, November 4, 2010

हमपर अपनों के अहसान बहुत है

हमपर  अपनों के अहसान बहुत है
उनकी मेहरबानियों की दास्तान बहुत है
सौ बार सवारा फिर भी उजरते ही चले गए
अरमानो के टूटे हुए काशान बहुत है
हर एक ने हमको मारा नादान समझ के
हम जानते थे इस राह में शमशान बहुत है
एक बार मेरे होंठो पे मुस्कान उभर आई थी
ये जानकार मेरे हमदर्द परेशान बहुत है
बेवफा वो नहीं तेरी किस्मत है दीपक
जो अब तक तेरी दुनियां वीरान बहुत है

4 comments:

  1. अच्छी रचना
    आपको सपरिवार दिपोत्सव की ढेरों शुभकामनाएँ
    मेरी पहली लघु कहानी पढ़ने के लिये आप सरोवर पर सादर आमंत्रित हैं

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  2. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  3. आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं ...

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  4. कई पुराणी यादें ताज़ा हो जातीं हैं
    आपके चंद शब्दों से......
    सौ बार सवारा फिर भी उजरते ही चले गए
    अरमानो के टूटे हुए काशान बहुत है..............

    पढ़कर अच्छा लगा

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